Breaking News

Banner

मिल्खा सिंह का निधन, 91 साल की उम्र में कोरोना के चलते फ्लाइंग सिख ने ली अंतिम सांस ।

# प्रदीप पटेल | 19 Jun, 2021

नई दिल्ली। भारत के महान धावक मिल्खा सिंह का कोरोना से 91 साल की उम्र में निधन हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर शोक जताया है। बता दें बीते दिन उनकी तबीयत काफी खराब हो गई थी। खबरों के मुताबिक उन्हें फिर बुखार आ गया था। और उनका ऑक्सीजन लेवल भी काफी कम हो गया था। 91 साल के मिल्खा सिंह कोरोना संक्रमित होने के बाद अस्पताल में भर्ती किए गए थे। जिसके बाद अब उनका निधन हो गया है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिल्खा सिंह के निधन पर शोक जताया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि, “हमने एक महान खिलाड़ी को खो दिया है। भारतीयों के दिलों में मिल्खा सिंह के लिए खास जगह थी। उन्होंने लोगों को अपने व्यक्तिव से प्रेरित किया। मैं उनके निधन से मैं बहुत दुखी हूं।

बता दें, मिल्खा सिंह का कोविड-19 परीक्षण बुधवार को निगेटिव आया था, जिसके बाद उन्हें कोविड आईसीयू से सामान्य आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया था। लेकिन फिर गुरुवार को उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई थी। इसी हफ्ते मिल्खा सिंह की पत्नी निर्मल मिल्खा सिंह का कोरोना से 85 साल की उम्र में निधन हुआ है। मिल्खा सिंह उस वक्त पीजीआई अस्पताल के आईसीयू में भर्ती थे। जिस कारण वो पत्नी के दाह संस्कार में शामिल नहीं हो सके थे।

मिल्खा सिंह तब दौड़ता था जब पैरों में जूते नहीं होते थे

फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह ने कहा था- नहीं जानता था कि ओलिंपिक गेम्स होते क्या हैं, एशियन गेम्स और वन हंड्रेड मीटर और फोर हंड्रेड मीटर रेस क्या होती है? मिल्खा सिंह तब दौड़ता था जब पैरों में जूते नहीं होते थे। न ही ट्रैक सूट होता था। न कोचेस थे और न ही स्टेडियम। 125 करोड़ है देश की आबादी। मुझे दुख इस बात का है कि अब तलक कोई दूसरा मिल्खा सिंह पैदा नहीं हो सका। उन्होंने कहा था कि मैं 90 साल का हो गया हूं, दिल में बस एक ही ख्वाहिश है कोई देश के लिए गोल्ड मेडल एथलेटिक्स में जीते। ओलंपिक में तिरंगा लहराए। नेशनल एंथम बजे। अपने हुनर से कई खिताब जीतने वाले मिल्खा सिंह ने दिल की ये टीस रोटरी क्लब के इवेंट ब्लेसिंग में शेयर की। तीन दिवसीय कार्यक्रम के अंतिम दिन वे बतौर स्पेशल गेस्ट पहुंचे थे।

नहीं चाहता था बेटा स्पोर्ट्स में जाए

फ्लाइंग सिख ने कहा था कि मैं और मेरी पत्नी निर्मल कौर दोनों स्पोटर्स पर्सन रहे हैं। वे वॉलीबॉल टीम की नेशनल कैप्टन थीं। हम नहीं चाहते थे कि हमारा बेटा जीव मिल्खा सिंह स्पोर्ट्स में जाए। मैं, मेजर ध्यानचंद और लाला अमरनाथ (क्रिकेटर) साथ के ही थे। मुझे लाला अमरनाथ बताते थे मैच खेलने के दो रुपए मिलते थे। मेरा भी वही हाल था, पैसे तो थे नहीं। मिल्खा सिंह ने कहा कि हमने तय किया बेटे को कोई प्रोफेशनल डिग्री दिलाएंगे। डॉक्टर, इंजीनियर वाली, मगर स्पोर्ट्स नहीं। मैं उसे शिमला के स्कूल में भेजना चाहता था, ताकि उसका ध्यान खेलों में न जाए। मगर कुछ और ही होना लिखा था शायद। एक बार स्कूल की तरफ से जूनियर गोल्फ में उसने (जीव मिल्खा) नेशनल जीता। फिर इंटरनेशनल के लिए लंदन और अमेरिका गया। 4 बार यूरोप की चैंपियनशिप जीती और फिर उसे पद्मश्री मिल गया।

न पैसे थे न सिफारिश, आर्मी से 3 बार हुआ रिजेक्ट

उन्होंने कहा था कि मुझे आर्मी से 3 बार रिजेक्ट किया गया। मेरी हाइट ठीक थी, दौड़ा भी। मेडिकल टेस्ट भी पास किया, मगर मुझे रिजेक्ट कर दिया गया। उस दौर में भी पैसे और सिफारिश चलती थी। ये सब मेरे पास नहीं था। लिहाजा मैं 3 बार रिजेक्ट हुआ। मगर ये भी सच है कि मैं इसके बाद जो कुछ बना वो आर्मी के कारण ही बना। वहां स्पोर्ट्स की ट्रेनिंग मिली, कोच मिले। तब कहीं जाकर मैं ये सब कर पाया।

पाकिस्तान में हुआ था जन्म

20 नवंबर 1929 को गोविंदपुरा (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है) के एक सिख परिवार में मिल्खा सिंह का जन्म हुआ था। खेल और देश से बहुत लगाव था, इस वजह से विभाजन के बाद भारत भाग आए और भारतीय सेना में शामिल हुए थे।

भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया

1956 में मेलबर्न में आयोजित ओलिंपिक खेल में भाग लिया। कुछ खास नहीं कर पाए, लेकिन आगे की स्पर्धाओं के रास्ते खोल दिए। 1958 में कटक में आयोजित नेशनल गेम्स में 200 और 400 मीटर में कई रिकॉर्ड बनाए। इसी साल टोक्यो में आयोजित एशियाई खेलों में 200 मीटर, 400 मीटर की स्पर्धाओं और राष्ट्रमंडल में 400 मीटर की रेस में स्वर्ण पदक जीते। उनकी सफलता को देखते हुए, भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया।